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'सभी के लिए सम्मान' सिखाने की यूएन की योजना का उद्देश्य भेदभाव से लड़ना है

ए.डी. मैकेंजी

पेरिस (आईडीएन) - "दुनिया को अब जिस चीज की जरूरत है, वह है प्यार" 1965 में बर्ट-बैकारक द्वारा लिखे इस गीत में एक भावुक संदेश है। लेकिन प्यार सिखाना अगर असंभव नहीं तो मुश्किल अवश्य है, इसलिए शिक्षा विशेषज्ञ एक अन्य समाधान लेकर आए हैं: सभी के लिए सम्मान सिखाना।

"और सभी से हमारा मतलब है सभी," यह कहना है विज्ञान, संस्कृति और शिक्षा के लिए जिम्मेदार संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी यूनेस्को में स्वास्थ्य और वैश्विक नागरिकता शिक्षा के अनुभाग में वरिष्ठ परियोजना अधिकारी क्रिस्टोफ़ कोर्नू का।

इस संगठन ने संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्राजील की सरकारों के साथ मिलकर शिक्षा के माध्यम से और शिक्षा के भीतर भेदभाव और हिंसा से लड़ने के लिए विशेष उपकरण और संसाधन तैयार करने का काम किया है, इसके बावजूद कि कई क्षेत्रों में घृणा और असहिष्णुता के स्तर में वृद्धि हुई है।

इन उपकरणों में एक 300 पृष्ठों का मैनुअल, संयुक्त राष्ट्र के लिए प्रासंगिक दस्तावेजों की एक श्रृंखला, ऑनलाइन संवादपरक फोरम और छात्रों की गतिविधियों के लिए प्रस्ताव जैसे आलेख लिखना और नाटकों का मंचन करना शामिल हैं, इन सभी पर पेरिस में 28 से 30 जनवरी तक आयोजित वैश्विक नागरिकता शिक्षा (जीसीईडी) विषय पर दूसरे यूनेस्को फोरम में प्रकाश डाला गया था।

कोर्नू ने आईडीएन को बताया "सभी के लिए सम्मान की शिक्षा देना आपसी सहिष्णुता के आधारों को मजबूत करके और सभी लोगों के लिए सम्मान उत्पन्न करके भेदभाव और हिंसा का मुकाबला करने के लिए एक शैक्षिक प्रतिक्रिया को बढ़ावा देने का साधन है"।

अपने मैनुअल में यूनेस्को का कहना है कि इस प्रोजेक्ट की नींव "सार्वभौमिक मूल्यों और मानव अधिकारों के मूल सिद्धांतों" पर रखी गयी है और इसका लक्ष्य 8 से 16 वर्ष की उम्र के शिक्षार्थियों को बनाया गया है जिसमें उनको "सभी स्तरों पर सम्मान उत्पन्न करने और भेदभाव को रोकने" के कौशल से सुसज्जित करने का उद्देश्य रखा गया है।

एजेंसी का कहना है "शैक्षिक संस्थानों को एक "समग्र" दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है जबकि "स्कूली परिवेश संबंधी कार्य के सभी पहलुओं को भेदभाव रहित बनाना सुनिश्चित करना होगा"।

इसका आगे कहना है कि "पाठ्यक्रम में रूढ़िवादी मुद्दों पर चर्चा करने और अन्याय की पहचान करने जैसे संवेदनशील मुद्दों के लिए समय दिया जाना चाहिए"। शिक्षक-प्रशिक्षण भी इस दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है क्योंकि शिक्षकों को - जो भेदभाव के शिकार हो सकते हैं - भी विवादों का समाधान करने और "भेदभाव के मुद्दों के साथ संवेदनशीलता" से निपटने में सक्षम होना आवश्यक है।

अधिकारियों का कहना है कि उग्रवाद और असहिष्णुता में वृद्धि के साथ पेरिस स्थित इस संगठन के मिशन की आकस्मिकता काफी बढ़ गयी है जिसने कुछ समूहों और व्यक्तियों को इसका शिकार बनाए जाते देखा है।

यूनेस्को की महानिदेशक इरीना बोकोवा के अनुसार, एजेंसी "दुनिया भर में भेदभाव बढ़ने" के समाधान के प्रयासों को मजबूत करने और विशेष रूप से वैश्विक नागरिकता शिक्षा को बढ़ावा देने में जुटी है।

बोकोवा ने एक सम्मेलन में कहा "जानकारी और सूचना के आदान प्रदान के इतने अधिक अवसर कभी उपलब्ध नहीं रहे, लेकिन असहिष्णुता, खास तौर पर एक हिंसक और विनाशकारी अतिवाद के रूप में काफी बढ़ गयी है"।

उन्होंने आगे कहा "युवा अक्सर परिवर्तन की मांग करते रहे हैं लेकिन वे भी इसके पहले शिकार हैं"। "तो फिर सभी के लिए एक अधिक शांतिपूर्ण और स्थायी भविष्य का निर्माण करने के लिए हमें किस प्रकार की शिक्षा की जरूरत है?"

यूनेस्को के अनुसार, वैश्विक नागरिकता शिक्षा का उद्देश्य "सभी उम्र के शिक्षार्थियों को उन मूल्यों, ज्ञान और कौशल के साथ सुसज्जित करना है जो मानव अधिकारों, सामाजिक न्याय, विविधता, लैंगिक समानता और पर्यावरणीय स्थिरता पर आधारित हैं और इनके लिए मन में सम्मान रखते हैं और जो शिक्षार्थियों को जिम्मेदार वैश्विक नागरिक बनने के लिए सशक्त करते हैं।"

इस बीच "सभी के लिए सम्मान की शिक्षा" में माता-पिता से लेकर विद्यार्थियों और नीति निर्धारकों तक समाज के सभी "हितधारकों" को शामिल करना आवश्यक है और मीडिया को भी एक भूमिका निभानी होगी।

यूनेस्को कार्यान्वयन मार्गदर्शक का कहना है "मीडिया जनता में जागरूकता बढ़ाने के लिए एक कर्तव्य-वाहक है"। "मीडिया कर्मियों को नकारात्मक रूढ़िवाद का मुकाबला करने, विविधता के प्रति सम्मान उत्पन्न करने और आम जनता के बीच सहिष्णुता को बढ़ावा देने की एक विशेष जिम्मेदारी है।"

वाशिंगटन डीसी स्थित हावर्ड विश्वविद्यालय की एसोसिएट प्रोफेसर और "टीचिंग रेस्पेक्ट फॉर ऑल" के लेखकों में से एक डॉ हेलेन बॉण्ड ने कहा, "भेदभाव की अभिव्यक्तियां" अनेक रूप ले सकती हैं।

जीईसीडी सम्मेलन के दौरान उन्होंने कहा कि इनमें डराना-धमकाना, गाली-गलौच, कट्टरपंथ, लांछन लगाना, यहूदी विरोधी भावना, इस्लाम का डर और लिंग तथा गरीबी-आधारित पूर्वाग्रह शामिल हो सकते हैं।

प्रतिभागियों ने बताया कि भेदभाव को "ऐसे लक्षित कानूनों के रूप में भी देखा जा सकता है जो कुछ वर्गों को कुछ सरकारी कार्यक्रमों की पहुंच प्राप्त करने से रोकते हैं"। उन्होंने कहा कि भेदभाव और असहिष्णुता आम तौर पर "छोटी-मोटी आक्रामकता" के साथ शुरू होती है और यह कि हिंसा कहीं अधिक बड़ी हो सकती है अगर नीति निर्माता आवश्यक कार्रवाई नहीं करते हैं।

फ्रांस में, चार्ली हेब्दो की ह्त्या और एक कोषर सुपरमार्केट में तत्संबंधी हमलों के बाद कुछ स्कूलों में छात्रों ने सरकार द्वारा अनुरोधित राष्ट्रीय मौन का पालन करने से इनकार कर दिया था जो मुख्यधारा से उनको अलग रखे जाने की उनकी भावनाओं और उस विवाद को उजागर करता है जो अखबार ने कट्टरपंथ और लांछन में जोड़ा था।

इसके अलावा, एक ऐसे मामले में जिसने कई लोगों को हैरान कर दिया था, नाइस के दक्षिणी फ्रांस सिटी में स्कूल के अधिकारियों ने एक 8 वर्षीय लड़के के बारे में पुलिस को सूचित किया था जब उस लड़ने ने "आतंकवादियों" के साथ "एकजुटता" व्यक्त की थी जबकि ऐसा प्रतीत होता था कि उसे "आतंकवाद" का अर्थ भी पता नहीं होगा।

दूसरी घटना जो पेरिस में एक जीसीईडी सम्मेलन के दौरान घटित हुई जिसने स्कूली व्यवस्था में "सभी के लिए सम्मान" की चर्चा करने और इस क्षेत्र में प्रशिक्षित शिक्षकों को बहाल करने के महत्व को रेखांकित किया।

कोर्नू ने आईडीएन बताया "यह त्रासदी पाठ्यक्रम में कुछ खामियों के बारे में आंखें खोलने वाली रही है।""हमें सभी छात्रों को एक साथ मिलकर रहने का तरीका सिखाने की जरूरत है और सिर्फ एक धर्म पर ध्यान केंद्रित करना सही दृष्टिकोण नहीं है।"

यूनेस्को की योजना में यह जांच की गयी थी कि "सभी के लिए सम्मान की शिक्षा" को कैसे स्कूल के पाठ्यक्रम में "समाहित" किया जा सकता है और कैसे "सभी विषयों में तथा स्कूल की संपूर्ण संस्कृति" में शामिल किया जा सकता है।

समस्याओं के विभिन्न पहलुओं को देखते हुए ब्राजील, आइवरी कोस्ट, ग्वाटेमाला, इंडोनेशिया और केन्या में पायलट प्रोजेक्ट कराए गए हैं। केन्याई सरकार ने शांति की शिक्षा के विकास पर ध्यान केंद्रित किया है जबकि आइवरी कोस्ट ने विकलांग लोगों के खिलाफ भेदभाव को रोकने के तरीकों का परीक्षण किया है।

"सभी के लिए सम्मान की शिक्षा" द्वारा उठाए गए कुछ सवालों में शामिल हैं: "कक्षाओं में मुश्किल विचार-विमर्शों और परिस्थितियों को कैसे प्रबंधित किया जा सकता है" और छात्रों को कैसे "भेदभाव, पूर्वाग्रह और डराने-धमकाने की स्थिति का सामना करने" के लिए सशक्त और प्रेरित किया जा सकता है?

बच्चों और युवाओं पर लक्षित यूनेस्को मैनुअल के एक अनुभाग में यह सलाह दी गयी है "बहादुर बनो और 'ना' कहो" इसके बावजूद कि "ऐसा करना आसान नहीं है"।

सलाहकारों का कहना है "हर किसी को सम्मानपूर्वक व्यवहार पाने का अधिकार है, बात चाहे कोई भी हो, उसके विरुद्ध भेदभाव किया जाना कभी भी ठीक नहीं है।" [आईडीएन-इनडेप्थन्यूज - 23 फ़रवरी, 2015]