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बच्चों के मीडिया का व्यवसायीकरण वैश्विक नागरिकता में बाधा बन रहा है

कलिंग सेनेविरत्ने द्वारा

कुआलालम्पुर (आईडीएन) - विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों के मीडिया, विशेष रूप से टेलीविजन, का अत्यधिक व्यावसायीकरण वैश्विक नागरिकता के लिए आवश्यक शिक्षा और क्षमता निर्माण तथा बच्चों के बीच दुनिया की विविधता के प्रति जागरूकता बढ़ाने के प्रयासों में बाधा डाल रहा है।

कुआलालंपुर में 'बच्चों के लिए मीडिया' पर हाल ही में आयोजित विश्व शिखर सम्मेलन में वक्ताओं ने 'ऑस्ट्रेलियन चिल्ड्रेंस टेलीविजन फाउंडेशन' के पूर्व निदेशक डॉ पेट्रीसिया एडगर के साथ सहमति व्यक्त की कि बच्चों के अधिकांश कार्यक्रम व्यावसायिक रूप से प्रेरित हैं और उचित शिक्षा प्रदान नहीं करते हैं।

"ये कम रचनात्मक और कम लागत में निर्मित कार्यक्रम अपने माल को बेचने के इरादे से मनोरंजन के लिए बनाए जाते हैं," उन्होंने 8 से 10 सितंबर के बीच शिखर सम्मेलन में प्रतिभागियों को बताया। "एक प्रभावी शैक्षिक कार्यक्रम अच्छे संस्कार, रचनात्मक संदेशों के बारे में होता है और सबसे महत्वपूर्ण बात, बच्चों के सामाजिक और भावनात्मक विकास में मदद करने के लिए उसमें स्थानीय तत्व शामिल होते हैं।"

मलेशिया के प्रधानमंत्री नजीब रजाक की पत्नी रोजमा मैन्सर ने कहा कि बच्चों के कार्यक्रमों को "विश्वास, नजरिए और व्यवहार का निर्माण करने वाले बहुमूल्य सबक सिखाने के लिए" डिजाइन जाना चाहिए जो उन्हें एक बहु-जातीय और बहु-धार्मिक समुदाय में रहने के लिए सक्षम बनाए।

उन्होंने तर्क दिया कि बच्चों के मीडिया को एक व्यावसायिक वस्तु की बजाय एक शैक्षिक उपकरण के रूप में देखा जाना चाहिए। आज आवश्यकता है शिक्षकों द्वारा मीडिया का उपयोग एक शिक्षण उपकरण के रूप में करने के कौशल में महारत हासिल करने की जो चिंतनशील और गंभीर सोच को बढ़ावा दे एवं जिज्ञासा को प्रोत्साहित करे। इस उद्देश्य के लिए, सरकारी नियामकों और नीति निर्माताओं को अविनियमन की बजाय, प्रोत्साहन तथा प्रभावी उपकरण के रूप में कानून का उपयोग कर मीडिया सामग्री पर लगाम लगनी चाहिए ताकि शिक्षा और सूचना के कार्यक्रमों की मात्रा और गुणवत्ता बेहतर की जा सके।

रोजमा तर्क देती हैं कि "बच्चों को मानवता की सबसे अच्छी चीजें देखनी चाहिए, केवल वह पक्ष नहीं जो रूढ़िबद्धता, अभद्र भाषा और दबंगई के माध्यम से संघर्ष पैदा करता है"। "अच्छी प्रोग्रामिंग बच्चों को मीडिया सामग्री के प्रति परेशान कर देने वाली भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से निपटने में और टीवी तथा विज्ञापनों पर हिंसा के बारे में समीक्षात्मक या आलोचनात्मक निर्णय करने के मदद कर सकती हैं।"

संयुक्त राष्ट्र ने वैश्विक नागरिकता को बढ़ावा देने के लिए तीन प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की स्थापना की है और ये सभी बच्चों के शैक्षिक और बौद्धिक विकास से संबंधित हैं। इनमें शामिल हैं हर बच्चे को स्कूल में भर्ती करना; शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार; और शिक्षा को एक परिवर्तनकारी प्रक्रिया बनाना जो जीवन के साझा मूल्यों को जीवंत बनाए।

बच्चों के वर्तमान मीडिया के आलोचकों का कहना है कि इन साझा मूल्यों का आज बहुत आभाव है, विशेष रूप से टेलीविजन कार्यक्रमों में - जब तक कि आपका यह मानना न हो कि ये साझा मूल्य 'व्यावसायिक उत्पाद' के प्रति रूचि पैदा कर रहे हैं जो और कुछ नहीं बल्कि प्रोग्रामरों द्वारा अपना माल बेचने के लिए निर्मित "काल्पनिक दुनिया" का एक उपोत्पाद भर है।

"यदि अच्छी वैश्विक नागरिकता का अर्थ है वैश्विक न्याय के लिए जुनून और दूसरों के प्रति दया, तो हमें बच्चों की कहानियों को कार्टून और लघु फिल्मों के रूप में विकसित करना होगा जो कम आयु से ही बच्चों में सही मूल्यों का निर्माण करें," जस्ट वर्ल्ड मूवमेंट के अध्यक्ष डॉ चंद्रा मुजफ्फर ने तर्क दिया।

उनका मानना है कि वैश्विक नागरिकता में सार्वभौमिक मूल्य समाहित होने चाहिए। "ऐसा नहीं है कि सभी पश्चिमी मूल्य निश्चित रूप से सार्वभौमिक हैं। और न ही सभी गैर-पश्चिमी मूल्य संकीर्ण हैं," उन्होंने कहा। "इसके विपरीत, हमारी अपनी धार्मिक और नैतिक परंपराओं में ऐसा बहुत कुछ है जो सार्वभौमिक है। स्थानीय भाषाओं और कला रूपों के माध्यम से इनका इस्तेमाल और इन्हें व्यक्त किया जाना चाहिए। इस प्रक्रिया के द्वारा हम स्थानीय सांस्कृतिक पहचान को और मजबूती प्रदान करते हैं।"

स्थानीय सांस्कृतिक पहचान को मजबूत बनाने का अर्थ यह नहीं है कि आप राष्ट्रवादी और अंतर्मुखी हो जाएं। अर्जेंटीना में IDIEM मीडिया अनुसंधान संस्थान की परियोजना डेवलपर आल्डाना डुहाल्डे कहती हैं कि सच्चाई ठीक इसके विपरीत है। एक क्षेत्रीय टेलीविजन परियोजना के माध्यम से उनकी टीम ने एक सीमा-रहित आम पहचान विकसित की है जिसे वे "सामाजिक प्रकार की पहचान" का नाम देती हैं जो प्रकृति और परिदृश्य के साथ पहचान स्थापित करने, आर्थिक रूप से आगे बढ़ने और स्वयं को कम विकसित के रूप में न देखे जाने की इच्छा, और समस्याओं के लिए अपने स्वयं के समाधान ढूँढने जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करती है।

डुहाल्डे ने IDN के साथ एक साक्षात्कार में तर्क दिया कि, "भौतिक वस्तुएँ उतनी महत्वपूर्ण नहीं हैं,"।"हमारे बीच प्यार की अभिव्यक्ति बहुत महत्वपूर्ण है ... एक दूसरे को सुनना। खुली जगह में अपनी भावनाओं को छुपाए बिना विभिन्न दृष्टिकोणों के बारे में जोरदार तरीके से चर्चा करना, और उनसे निपटना।"

स्वीडन के फिल्मकार फ्रेड्रिक होल्मबर्ग ने IDN को बताया कि सार्वजनिक सेवा प्रसारण मूल्यों को पुनर्जीवित करने के लिए एक वैश्विक अभियान शुरू करने की जरूरत है। "इसमें हमें कई तरह के विचार तथा और अधिक विविधता को समाहित करने की आवश्यकता है," उन्होंने तर्क दिया। "मीडिया का अर्थ केवल लोगों से जुड़ना ही नहीं, बल्कि अंदर झांकन भी है। हमें एक ही समय में वैश्विक और स्थानिक (ग्लोकल), दोनों रहना होगा।"

होल्मबर्ग का मानना है कि बच्चों के मीडिया को एक सार्वजनिक निवेश के रूप में देखा जाना चाहिए। "हम बच्चों को उपभोक्ताओं के रूप में नहीं देखना चाहिए। बच्चों के लिए कार्यक्रमों का निर्माण महंगा अवश्य है, लेकिन हमें जनता के पैसों से इसका भुगतान करना चाहिए।"

कुआलालंपुर शिखर सम्मेलन में दुनिया भर के कई वक्ताओं द्वारा बारम्बार इस तर्क का इस्तेमाल किया गया। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि किसी में भी इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह जनता के धन के संबंध में सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाए, विशेष रूप से ऐसे हथियारों की खरीद के लिए आवंटित भारी बजट जिनका शायद ही कभी इस्तेमाल किया जाता है। [IDN-InDepthNews – अक्टूबर 5, 2014]