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एक बौद्ध नन (मठवासिन) महिला सशक्तिकरण के लिए आदर्श बनी

कलिंगा सेनेविराटने* द्वारा| आईडीएन-इनडेप्थ न्यूज़फीचर

सिंगापुर (आईडीएन) – महिलाओं को संघ (बुद्ध के शिष्यों का वर्ग) में विधिवत शामिल करके, गौतम बुद्ध ने 2500 वर्ष पहले भारत में महिलाओं को पुरूषों के बराबर सम्मान प्रदान किया था। लेकिन आज अधिकांश एशियाई बौद्ध देशों में ननें धम्मा (बुद्ध के उपदेश) की विश्वसनीय शिक्षिकाओं के रूप में मान्यता पाने के लिए एक कठिन लड़ाई लड़ रही हैं। संभव है एक नेपाली नन धम्मा का एक प्रकार से गायन करके अनचाहे इस बोध में परिवर्तन ला रही है।

 बुद्ध के उपदेशों और उनके सिद्धांतों की सारी समझ और उनके प्रति सम्मान के साथ, मैं कभी स्वयं को कोई नाम नहीं देती हूँ, मैं बस वही करती हूँ जो मेरा हृदय करना चाहता है,नेपाली बौद्ध नन अनी चोयिंग ड्रोलमा ने एक साक्षात्कार में कहा।

अनी चोयिंग ड्रोलमा ने, जिन्होंने विश्व संगीत के क्षेत्र में नाम कमाया है, हाल के वर्षों में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ताइवान और सिंगापुर जैसे देशों में भरी सभाओं में प्रदर्शन किया है। इस प्रकार उन्होंने, बहुत धन कमाया है, जिसे वे एक फाउंडेशन में निवेश करती हैं जिसकी स्थापना उन्होंने नेपाल में निर्धन महिलाओं को शिक्षित करने और उन्हें रूढ़िवादी पुरुष-प्रधान समाज में सशक्त बनाने के लिए की है।    

उसी देश में जहाँ बुद्ध का जन्म हुआ था, काठमांडू में एक तिब्बती शऱणार्थी परिवार में 1970 में जन्म लेकर, वे मूल रूप से अपने अपशब्द कहने वाले पिता से दूर जाने के लिए 13 वर्ष की आयु में नन बन गईं।  उन्होंने काठमांडू घाटी की उत्तरी चढ़ाइयों पर एक बौद्ध मठ, नागी गोम्पा में प्रवेश किया, जहाँ उनकी शिक्षा और आध्यात्मिक प्रशिक्षण का पर्यवेक्षण प्रसिद्ध ध्यान गुरू टुल्कु उर्ग्येन रिनपोंचे ने किया, जो नागी गोम्पा के मुख्य लामा थे। उनकी पत्नी ने अनी चोयिंग को पवित्र मंत्रों का गायन करना सिखाया। उनकी प्रतिभा तेजी से उभरी और मठ में मंत्र गुरू के पद पर, उन्होंने सभी धार्मिक अनुष्ठानों और मंत्रों का नेतृत्व किया।

अनी चोयिंग ने वहाँ से बहुत लंबी यात्रा तय कर ली है और आज वे नेपाल तथा सारे एशिया में महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए एक आदर्श बन चुकी हैं। वे धाराप्रवाह अंग्रेजी वक्ता हैं और विश्व भर में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में नियमित रूप से भाषण देती हैं।  

हम सब माँ के गर्भ में समान ढंग से (लड़कों की तरह) समान सम्मान, समान खुशी के साथ उत्पन्न होती हैं और इस दुनिया में नहीं आने तक समान ढंग से पोषण पाती हैं,अनी चोयिंग कहती हैं, और तर्क पेश करती हैं कि उसके बाद लड़कों और लड़कियों को भिन्न भूमिकाएं आबंटित की जाती हैं, जो कि एक पुरूषों द्वारा सृजित संस्कृति है। मेरा विश्वास है कि वह गलत समझ है, प्रकृति कभी पक्षपात नहीं करती है।

यह पूछने पर कि वह क्या है जो उन्हें न केवल नेपाल में बल्कि दुनिया भर में अपना गायन प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित करता है, उनका उत्तर था:मैं कोई दुखद गीत या सांसारिक गीत नहीं गाती हूँ। मैं आध्यात्मिक गीत, ध्यान के गीत गाती हूँ और बुद्ध के शब्दों का अनुवाद अत्यंत सरल काव्यमय भाषा में किया गया है जिन्हें एक संगीतमय गीत में रूपांतरित किया गया है। मेरे गायन का मुख्य प्रयोजन है मुझे बुद्ध के ज्ञान को उस सरलता के साथ कह सकने में सक्षम करना जिसका अर्थ कोई भी राह चलता इंसान समझ सके। ताकि जो लोग उसे सुन सकते हों वे परम आनंद के कम से कम एक क्षण का आस्वादन करें।

उनका संगीत का करियर 1994 में तब शुरू हुआ जब नेपाल की यात्रा के दौरान अमेरिकी गिटारवादक स्टीव टिब्बेट्स ने अनी चोयिंग से मुलाकात की और उनकी मंत्रोच्चारण को सुना। वे उनकी गायन प्रतिभा से तुरंत प्रभावित हुए और अंततः आश्रमके एक छोटे से कक्ष में उसे एक कैसेट रिकॉर्डर में रिकॉर्ड कर सकने में सक्षम हुए। इसका परिणाम था एक सहयोगीएलबम चो, जिसकी 1997 में जारी होने पर बहुत प्रशंसा की गई।

मैंने कभी एक गायिका बनने के लिए तकनीकी प्रशिक्षण नहीं लिया था और न ही कभी मैं गायिका बनना चाहती थी। जब आप कोई गायिका बनने का करियर अपनाते हैं, तो आपकी मुख्य अभिलाषा होती है प्रसिद्ध होना या ढेर सारा पैसा कमाना। लेकिन मेरे साथ ऐसी कोई बात नहीं थी,अनी चोयिंगने अपनी संगीतमय यात्रा की शुरुआत को याद करते हुए कहा। जो कुछ हुआ वह था इस संगीतज्ञ का मठ में आना और मुझे कुछ प्रार्थनाओं को गाते हुए सुनना। उन्होंने मुझे कुछ रिकॉर्ड करने के लिए कहा। बाद में वे उसे अमेरिका ले गए और अपने संगीत के साथ मिश्रित किया और उसे एक प्रस्ताव के साथ वापस भेजा, जिसमें उन्होंने पूछा कि क्या मुझे उसका एल्बम बनाने में दिलचस्पी है

1997 और 2011 के बीच अनी चोयिंग ने 12 सीडी जारी किए हैं और बुद्धा बार और फिल्म मिलारेपा के साउंड ट्रैक सहित संगीत के संकलनोंमें योगदान किया। अमेरिका में उनके पहले संगीत समारोह की यात्रा की सफलता के बाद, वे सारे यूरोप, उत्तर अमेरिका, यूके, सिंगापुर, चीन, ताइवान और एशिया के कई अन्य देशों में संगीत समारोहों और उत्सवों में प्रदर्शन करने लगीं। उन्होंने पश्चिमी श्रोताओं में तिब्बती बौद्ध मंत्रों को लोकप्रिय बनाने में प्रमुख भूमिका निभाई। [आईडीएन- इनडेप्थन्यूज़ – 12 जुलाई 2014]